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Wednesday, January 8, 2014

झाडू: हरियाणा में बड़े   सियासी दलों का कार्यकर्ता होने क...

झाडू: हरियाणा में बड़े   सियासी दलों का कार्यकर्ता होने क...: हरियाणा में बड़े    सियासी दलों का कार्यकर्ता होने का मतलब है सत्ता में आने के बाद  कार्यकर्ता की चांदी   होना । इसी लिए आपको जितने कार्यकर्...
हरियाणा में बड़े   सियासी दलों का कार्यकर्ता होने का मतलब है सत्ता में आने के बाद  कार्यकर्ता की चांदी  होना । इसी लिए आपको जितने कार्यकर्ता हरियाणा में मिलेंगे उतने भारत में कहीं और नहीं । ज़रूरी नहीं है कि हरेक कार्यकर्ता सत्ता के मज़े ले ले क्योंकि यह सब गट्स {कौशल} पर निर्भर होता है लेकिन सत्ता के प्रसाद  की वर्षा  पहले दिन से  ही शुरू हो  जाती है। "नौकरी और कार्यकर्ता" का अटूट रिश्ता है यहाँ । पहले नौकरी फिर मनपसंद पोस्टिंग और फिर तबादला न होने देना,ये किसी भी कार्यकर्ता की सरकार में पैठ के लक्षण हैं । 
हरियाणा में "प्रसाद" की मात्र तय है। मुख्यमंत्री का परिवार मुख्यतः रियल एस्टेट, शराब और  खनन के कारोबार की देख्भाल करता है ।इस परिवार की सक्रियता के केंद्र गुडगाँव और फरीदाबाद रहते हैं लेकिन सुलतान ने रोहतक , झज्जर, सोनीपत ,पंचकुला ज़िलों तक इसका विस्तार किया है । इस कारोबार से जो अकूत दौलत शाही ख़ज़ाने में आती है उसे निवेश करने का पूरा तंत्र है । इस तंत्र में लगे परिवार के भरोसेमंद लोग अदृश्य रह कर काम करते हैं  और जो संदिग्ध होते हैं वे भी अति साधारण जीवन जीते दिखते  हैं। ऐसे लोग रियल एस्टेट कम्पनियों में डायरेक्टर वगैरा होने के बावजूद चप्पल पहने शहर की सकों पर देखे जा सकते हैं । 
एक बड़ा नियम है कि चाहे मंत्री हो या विधायक ,कोई भी प्रसाद मुख्यमंत्री की सहमति व अनुमति के बिना ग्रहण नहीं कर सकता। एकदम फुलप्रूफ सिस्टम है जिसका संचालन मुख्यमंत्री के चंडीगढ़ बैठे चहेते अफसर करते हैं । ये अफसर चूंकि हरेक गुनाह के राज़दार होते हैं तो इन्हे प्रसाद लेने के लिए अनुमति नहीं लेनी होती ।  इतना ही नहीं इन कर्मठ और निष्ठावान अफसरों को रिटायर होने के बाद भी तरह -तरह की पोस्ट देकर सत्ता के गलियारे में ही रखा जाता है । 
मंत्री और कुछ विधायक मलाईदार पोस्ट्स और ठिकानों पर नियंत्रण रखते हैं  और उस ठिकाने पर बैठे अपने आदमी से मोटी मासिक क़िस्त पाते रहते हैं या कई दफा एकमुश्त माल लेकर अफसर या कर्मचारी को सरकार से लूट का लाइसेंस दिल देते हैं । नौकरियों की बंदरबांट कार्यकर्ताओं में होती है । शराब के ठेके ,टेंडर  और छुटपुट चीजों के बंटबारे को लेकर खेल चलता रहता है । 
कुल मिलाकर इतने विधिवत और कुशलतापूर्ण तरीके से सब कुछ चलता है कि मुख्यमंत्री छाती ठोककर चुनौती भरे स्वर में  कहता है कि कोई सिद्ध कर दे ककि  मैंने या मेरे परिवार के किसी मेंबर ने कभी सरकार से एक पैसे का भी फायदा उठाया हो । सच सब जानते हैं लेकिन सिद्ध कौन करे । "चोर -चोर" "भाई -भाई" । शीर्ष परिवार ,मंत्री ,नेता ,विपक्ष ,अफसर ,दलाल ,गुर्गे …सब रिश्तेदार हैं ।       

Friday, January 3, 2014

झाडू: अरविन्द केजरीवाल की असल ताकत उनकी ईमानदारी में ही ...

झाडू: अरविन्द केजरीवाल की असल ताकत उनकी ईमानदारी में ही ...: अरविन्द केजरीवाल की असल ताकत उनकी ईमानदारी में ही निहित है । समूचा देश उन पर नज़र रखे है । उनके आचरण पर आम जनता की पैनी दृष्टि है । वे अगर अ...
अरविन्द केजरीवाल की असल ताकत उनकी ईमानदारी में ही निहित है । समूचा देश उन पर नज़र रखे है । उनके आचरण पर आम जनता की पैनी दृष्टि है । वे अगर अपने बहुप्रचारित सिद्धांतों से तनिक भी समझौता करेंगे तो जनता की आलोचना से बच नहीं सकते । भारत के लोग जो सुविधा और छूट दूसरे  नेताओं को देते हैं ,वह अरविन्द को नहीं मिलेगी और मिलनी भी नहीं चाहिए ।दशकों के  घोर अँधेरे के बाद एक मद्दिम सी रोशनी  दिखी है । अगर यह रोशनी कमज़ोर पड़ी तो हिंदुस्तान को  घने  अँधेरे के एक और  दौर में जाने के लिए विवश होना पड़ेगा । सवाल अरविन्द का नहीं है ,सवाल करोड़ों लोगों की उम्मीद का है जिसके प्रतीक अरविन्द हैं। 
अरविन्द जिस राह पर चले हैं वह  आसान नहीं है । उन्हें याद रखना पड़ेगा कि कोई भी यूँ ही दधीचि या हरिशचन्द्र नहीं बनता ।उन्हें खुद को स्वाह करना पड़ेगा।वे अब ईश्वरीय सत्ता में भरोसा करने लगे हैं तो उन्हें यह भान भी होना चाहिए कि उन्हें ईश्वर ने किस काम के लिए चुना है। राम बनने के लिए सत्ता का त्याग पहली शर्त है । नियति ने अरविन्द को सत्ता की कसौटी पर कसने का इरादा किया है। उनके ऊपर यह जिम्मेवारी है कि वह इस स्थापित मान्यता को गलत सिद्ध करें कि सत्ता भ्रष्ट करती है। 
अरविन्द का सत्ता से साक्षात्कार अभी शुरू हुआ है  और अभी बहुत लम्बी यात्रा शेष है। आज उन्होंने बड़े बंगले में रहना मंजूर कर लिया है । निश्चित ही यह नैतिक रूप से गलत है। शास्त्र कहते है कि "आपात्काले मर्यादा नास्ति" लेकिन मर्यादा का पालन तो आपातकाल में होता है । साधारण और अनुकूल  स्थितियों में तो कोई भी मर्यादा का पालन कर लेगा। यह देश भ्रष्टाचार से त्रस्त है जो इसकी अन्नत सम्भावनाओं को लील रहा है । इस देश के लोगों का राजनीति से भरोसा उठ रहा है।यह चरम निराशा का दौर है । यह निराशा थोड़ी भी बढ़ी तो राष्ट्रीय अवसाद सामने खड़ा है। 
अरविन्द को उच्च आदर्श कायम करने ही होंगे और इसके लिए उन्हें अपने आदर्शों व सिद्धांतों को हर पल सींचना होगा । उनका लगातार विस्तार करना होगा। उनसे अपेक्षित था कि वे यह घोषणा करते कि मैं कौशाम्बी के अपने फ्लैट से ही सरकार चलाऊंगा या दिल्ली सचिवालय में ही एक कमरे में चटाई या खाट डाल लूँगा। उनकी सादगी यदि सत्ता के उनके सफ़र के साथ -साथ बढ़ेगी तो ही वे टिक सकेंगे।उनके विरोधी उन्हें चैन से जीने नहीं देंगे। अभी तो आरोप लगने शुरू हुए हैं और अच्छी बात यह है कि आरोप वे लोग लगा रहे हैं जो जनता के एक बड़े तबके में खुद अपनी साख खो चुके हैं लेकिन जब उनका अपना आम आदमी इन आरोपो भरोसा करने लगेगा तो मुश्किल खड़ी  हो जायेगी । शिखर पर प्राण वायु बेहद अल्प मात्र में होती है । वहाँ बने रहने के लिए कड़े योगाभ्यास की  दरकार होती है । अरविन्द आज शिखर पर हैं । नैतिक शक्ति की  ऑक्सीजन गर थोड़ी भी कम हुई तो शिखर ही धक्का दे देगा क्योंकि शिखर निर्मम होते हैं ।                   

झाडू: 2013 क्या आंदोलनो का अंतिम वर्ष था ?जन -संघर्ष और ...

झाडू: 2013 क्या आंदोलनो का अंतिम वर्ष था ?जन -संघर्ष और ...: 2013 क्या आंदोलनो का अंतिम वर्ष था ?जन -संघर्ष और आंदोलन तो अब सत्तारूढ़ हो गए हैं । सड़क का विरोध और संघर्ष तो रामलीला मैदान से लुटियन जोन म...
2013 क्या आंदोलनो का अंतिम वर्ष था ?जन -संघर्ष और आंदोलन तो अब सत्तारूढ़ हो गए हैं । सड़क का विरोध और संघर्ष तो रामलीला मैदान से लुटियन जोन में पहुँच गया है । मुझे तो लोकतंत्र के लिए असली खतरा अब नज़र आ रहा है । आम आदमी पार्टी के खिलाफ लड़ने की जिम्मेवारी क्या कांग्रेस या भाजपा पर छोड़ी जा सकती है? वक़्त की जरूरत है कि गैर- कांग्रेसी ,गैर- भाजपाई और गैर- आपाई विपक्ष भी खड़ा किया जाए । कांग्रेस या भाजपा "आप" का विरोध नहीं हो सकतीं । केवल सदन का विपक्ष लोकतंत्र को ज़िंदा नहीं रख सकता । विपक्ष सड़क पर चाहिए और वह भी हरदम ।

झाडू: "कुमार विशवास अमेठी से राहुल गांधी के खिलाफ चुनाव ...

झाडू: "कुमार विशवास अमेठी से राहुल गांधी के खिलाफ चुनाव ...: "कुमार विशवास अमेठी से राहुल गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ेंगे" यह घोषणा किस आधार पर हुई । क्या उन्होंने अमेठी क्षेत्र से सौ लोगों के ल...
"कुमार विशवास अमेठी से राहुल गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ेंगे" यह घोषणा किस आधार पर हुई । क्या उन्होंने अमेठी क्षेत्र से सौ लोगों के लिखित समर्थन "आप" के ऑफिस में जमा करा दिए हैं ? पार्टी ने उन्हें किन मापदंडों पर प्रत्याशी चुना है ?या वह सिर्फ लफ्फाज़ी कर रहें हैं ? दोहरे मापदंड "आप" को महँगे पड़ेंगे ।