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Friday, January 3, 2014

अरविन्द केजरीवाल की असल ताकत उनकी ईमानदारी में ही निहित है । समूचा देश उन पर नज़र रखे है । उनके आचरण पर आम जनता की पैनी दृष्टि है । वे अगर अपने बहुप्रचारित सिद्धांतों से तनिक भी समझौता करेंगे तो जनता की आलोचना से बच नहीं सकते । भारत के लोग जो सुविधा और छूट दूसरे  नेताओं को देते हैं ,वह अरविन्द को नहीं मिलेगी और मिलनी भी नहीं चाहिए ।दशकों के  घोर अँधेरे के बाद एक मद्दिम सी रोशनी  दिखी है । अगर यह रोशनी कमज़ोर पड़ी तो हिंदुस्तान को  घने  अँधेरे के एक और  दौर में जाने के लिए विवश होना पड़ेगा । सवाल अरविन्द का नहीं है ,सवाल करोड़ों लोगों की उम्मीद का है जिसके प्रतीक अरविन्द हैं। 
अरविन्द जिस राह पर चले हैं वह  आसान नहीं है । उन्हें याद रखना पड़ेगा कि कोई भी यूँ ही दधीचि या हरिशचन्द्र नहीं बनता ।उन्हें खुद को स्वाह करना पड़ेगा।वे अब ईश्वरीय सत्ता में भरोसा करने लगे हैं तो उन्हें यह भान भी होना चाहिए कि उन्हें ईश्वर ने किस काम के लिए चुना है। राम बनने के लिए सत्ता का त्याग पहली शर्त है । नियति ने अरविन्द को सत्ता की कसौटी पर कसने का इरादा किया है। उनके ऊपर यह जिम्मेवारी है कि वह इस स्थापित मान्यता को गलत सिद्ध करें कि सत्ता भ्रष्ट करती है। 
अरविन्द का सत्ता से साक्षात्कार अभी शुरू हुआ है  और अभी बहुत लम्बी यात्रा शेष है। आज उन्होंने बड़े बंगले में रहना मंजूर कर लिया है । निश्चित ही यह नैतिक रूप से गलत है। शास्त्र कहते है कि "आपात्काले मर्यादा नास्ति" लेकिन मर्यादा का पालन तो आपातकाल में होता है । साधारण और अनुकूल  स्थितियों में तो कोई भी मर्यादा का पालन कर लेगा। यह देश भ्रष्टाचार से त्रस्त है जो इसकी अन्नत सम्भावनाओं को लील रहा है । इस देश के लोगों का राजनीति से भरोसा उठ रहा है।यह चरम निराशा का दौर है । यह निराशा थोड़ी भी बढ़ी तो राष्ट्रीय अवसाद सामने खड़ा है। 
अरविन्द को उच्च आदर्श कायम करने ही होंगे और इसके लिए उन्हें अपने आदर्शों व सिद्धांतों को हर पल सींचना होगा । उनका लगातार विस्तार करना होगा। उनसे अपेक्षित था कि वे यह घोषणा करते कि मैं कौशाम्बी के अपने फ्लैट से ही सरकार चलाऊंगा या दिल्ली सचिवालय में ही एक कमरे में चटाई या खाट डाल लूँगा। उनकी सादगी यदि सत्ता के उनके सफ़र के साथ -साथ बढ़ेगी तो ही वे टिक सकेंगे।उनके विरोधी उन्हें चैन से जीने नहीं देंगे। अभी तो आरोप लगने शुरू हुए हैं और अच्छी बात यह है कि आरोप वे लोग लगा रहे हैं जो जनता के एक बड़े तबके में खुद अपनी साख खो चुके हैं लेकिन जब उनका अपना आम आदमी इन आरोपो भरोसा करने लगेगा तो मुश्किल खड़ी  हो जायेगी । शिखर पर प्राण वायु बेहद अल्प मात्र में होती है । वहाँ बने रहने के लिए कड़े योगाभ्यास की  दरकार होती है । अरविन्द आज शिखर पर हैं । नैतिक शक्ति की  ऑक्सीजन गर थोड़ी भी कम हुई तो शिखर ही धक्का दे देगा क्योंकि शिखर निर्मम होते हैं ।                   

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